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पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति एवं संभावनाएँ


ब्रह्माजी राव,
अखिल भारतीय मंत्री एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र संगठन मंत्री
विद्या भारती

राष्ट्र संघ में कुल 252 देश हैं। इन देशों में प्रायः 700 करोड़ लोग रहते हैं। दुनिया में अत्यधिक संख्या में लोग मंडारिन (चीनी) भाषा में बात करते हैं। दूसरे स्थान पर अंग्रेजी, तीसरे स्थान पर स्पेनिश तथा चैथे स्थान पर हिन्दी है। वैसे अपने देश में 171 भाषा एवं 544 बोलियाँ हैं। इनमें सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी है। कई राज्यों की यह मातृभाषा भी है। देश की राजभाषा हिन्दी है और व्यावहारिक रूप से देश की राष्ट्रभाषा भी है। प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को ‘हिन्दी दिवस’ विश्वभर में मनाया जाता है। अब हिन्दी ने भारतभूमि की सीमा का अतिक्रमण कर विदेशों तक अपना विस्तार सफलतापूर्वक कर लिया है। अपनी ग्रहणशीलता गुण के कारण यह भाषा विदेशीभूमि में भी निरंतर विकसित हो रही है। किसी भी भाषा के दो रूप होते हैं। – मौखिक और लिखित एवं दो प्रकार से भाषा का उपयोग किया जा सकता है – 1. साहित्यिक भाषा और 2. राजभाषा। इस दृष्टि से हिन्दी व्यावहारिक और समृद्ध भाषा है।

पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी

पूर्वोत्तर भारत:

अंग्रेजों के शासनकाल में पूर्वोत्तर में मुख्यतः वर्तमान के असम को केन्द्र करके सरकारी काम राजधानी शिलांग से चलता था। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद धार्मिक एवं राजनैतिक कारणों से छोटे-छोटे राज्य बने हैं। पहले असम, अरूणाचल, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैण्ड, बाद में सिक्किम इससे जुड़ा है। इन्हें सात बहन और एक भाई ऐसा कहा जाता है। इन आठ राज्यों के विकास हेतु भारत सरकार ने वर्ष 1971 में पूर्वोत्तर परिषद (नाॅर्थ ईस्टर्न काउंसिल -NEC) बनाई। उत्तर पूर्वीय क्षेत्र विकास मंत्रालय (DoNER) का वर्ष 2001 में गठन हुआ।

यह क्षेत्र वैविध्य की दृष्टि से एक विलक्षण क्षेत्र है। प्राक्रतिक सुषमा, जैव विविधता, लोक-साहित्य एवं लोक-संस्कृति में अनुपमेय है। पहाड़ों, पर्वतों, नदियों झरनों, वनों से व्याप्त यह एक रमणीय एवं दुर्गम क्षेत्र है। अपनी अनूठी संस्कृति, हस्तशिल्प और प्राकृतिक सुंदरता के लिये जाना जाता है। यहाँ के मूलनिवासी (असमीया तथा विभिन्न जनजाति के लोग) सहज-सरल स्वभाव के शांतिप्रिय एवं अतिथि परायण होते हैं।

पूर्वोत्तर एक अहिन्दी भाषी क्षेत्र है। यहाँ हजारों वर्षों से असमीया भाषा संपर्क भाषा रही है। यहाँ असमीया के साथ ही बंगला, नेपाली, मणिपुरी, अंग्रेजी, खासी, गारो, निशी, आदि, मोनपा, वांग्चु, नागामीज, मिजो, काॅकबराक, लेप्चा, भुटिया और गिनते-गिनते इन आठ राज्यों में प्रायः 200 विभिन्न भाषायें एवं बोलियां प्रचलित हैं। अधिकांश भाषा एवं बोलियां तिब्बत-बर्मी परिवार की होने के कारण अलग से पहचानी जाती हैं। विविधताओं के कारण इस अंचल को ‘भाषाओं की प्रयोगशाला’ कहा जाता है। यातायात की असुविधा पूर्वोत्तर की एक बड़ी समस्या है। सड़क परिवहन ही यहाँ प्रधान है। अधिकांशतः कच्ची सड़कें (82,000 कि.मी. में से 56,000 कि.मी.) हैं। रेल यातायात बहुत कम है। प्राचीन काल से लोगों का दूर तक आना-जाना कम होने के कारण भी बड़ी संख्या में बोलियों का विकास हुआ। पूर्वोत्तर एक ऐसा क्षेत्र है जो कभी मुगलों का गुलाम न बना। औरंगजेब के समय 17 बार असम पर आक्रमण करने के बाद भी विजय प्राप्त न कर सके। लाचित बड़फुकन की वीरता के आगे मुगल सेना में 30,000 पैदल सैनिक, 15,000 तीरंदाज, 18,000 तुर्की घुड़सवार, 5,000 बंदूकची और 1,000 से अधिक तोपों के अलावा नौकाओं का विशाल बेड़ा होने के बाद भी विजय प्राप्त न कर सके। यह क्षेत्र भारत के अन्य प्रदेशों से विच्छिन्न रहने एवं हिन्दी भाषा के प्रभाव से दूर रहने का यह भी एक कारण है।

अतीत एवं वर्तमान:

पूर्वोत्तर भारत में अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं। जिनकी अपनी-अपनी भाषाएँ तथा बोलियां हैं। इनमें बोड़ो, कछारी, जयंतिया, कोच, त्रिपुरी, गारो, राभा, देउरी, दिमासा, रियांग, लालुंग, नागा, मिजो, त्रिपुरी, जामातिया, खासी, कार्बी, मिसिंग, निशी, आदी, आपातानी, इत्यादि प्रमुख हैं। पूर्वोत्तर की भाषाओं में से केवल असमिया, बोड़ो और मणिपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिला है। सभी राज्यों में हिन्दी भाषा का प्रयोग अधिकांश प्रवासी हिन्दी भाषियों द्वारा आपस में किया जाता है। व्यवसायिक कारोबारी, रिक्शा चालक, नाई, कूलियों, रेलकर्मचारियों, मजदूरों तथा सेना के मध्य हिन्दी का काम चलाऊ प्रयोग होता है। असम, अरूणाचल, सिक्किम को छोड़कर अन्य राज्यों – नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा में सरकारी कामकाज अंग्रेजी भाषा में होते हैं।

पूर्वोत्तर में हिन्दी का औपचारिक रूप से प्रवेश वर्ष 1934 में हुआ, जब महात्मा गांधी ‘अखिल भारतीय हरिजन सभा’ की स्थापना हेतु असम आये। उस समय गड़मूड़ (माजुली) के सत्राधिकार (वैष्णव धर्मगुरू) एवं स्वतंत्रता सेनानी श्री श्री पीताम्बर देव गोस्वामी के आग्रह पर गांधी जी संतुष्ट होकर ‘बाबा राघव दास जी’ को हिन्दी प्रचारक के रूप में असम भेजा।

वर्ष 1938 में ‘असम हिन्दी प्रचार समिति’ की स्थापना गुवाहाटी में हुई। यह समिति आगे चलकर ‘असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ बनी। आम लोगों में हिन्दी भाषा तथा साहित्य के प्रचार-प्रसार करने हेतु- प्रबोध, विशारद, प्रवीण, आदि परीक्षाओं का आयोजन इस समिति के द्वारा होता आ रहा है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, गुवाहाटी के द्वारा हिन्दी शिक्षकों और हिन्दी प्रचारकों के लिये प्रशिक्षण दिया जाता है।

पूर्वोत्तर भारत में जो हिन्दी प्रचार-प्रसार में लगी हुई है, ऐसी कुछ संस्थाऐं –

असम के गुवाहाटी से प्रकाशित समाचार पत्र दैनिक पूर्वोदय, पूर्वांचल प्रहरी, प्रातः खबर, सेंटिनल, सिचलर से प्रकाशित प्रेरणा भारती, अरुणाचल से प्रकाशित अरूणभूमि की हिन्दी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका है।

मणिपुर मेे हिन्दी:

वर्ष 1928 – ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के द्वारा हिन्दी का प्रचार-प्रसार प्रारम्भ हुआ, वर्ष 1953 – मणिपुर हिन्दी परिषद की स्थापना हुई। मणिपुर में हिन्दी के प्रचारक के रूप में – 1. लाइयुम ललित माधव शर्मा 2. टी.वी. शास्त्री 3. फु. गोकुलानंद 4. एन. तोम्बीसिंह 5. हेमाम नीलमणि सिंह 6. अरिबम पंडित राधा मोहन शर्मा 7. क. हिमाचार्य शर्मा 8. एस. नीलवीर शर्मा शास्त्री 9. अरिबम घनश्याम शर्मा 10. राधागोविंद थोङाम 11. कालाचाँद शास्त्री 12. नन्दलाल शर्मा 13. नवीन चाँद 14. सिजगुरुमयुम 15. लाइमयुम नारायण शर्मा 16. फिराइलात्पम पंडित जगदीश शर्मा 17. द्विजमणि देव शर्मा ने सेवायें दी।

नागालैंड में हिन्दी:

केन्द्रीय हिन्दी संथान, नागालैंड द्वारा वर्ष 1972 में शिक्षक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन। श्री पी.टी. जामीर दीमापुर के निवासी हैं। इन्होनें अपना सम्पूर्ण जीवन नागालैंड में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये समर्पित कर दिया। हिन्दी के साधक एवं महात्मा गांधी के परम भक्त हैं। श्री पी.टी. जामीर आतंकवादियों के कोप भाजन होकर भी हिन्दी का प्रचार-प्रसार का कार्य निष्ठापूर्वक करते रहे हैं। विद्या भारती नागालैंड के कुछ वर्ष अध्यक्ष भी रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए हैं, जिनमें से भारत के राष्ट्रपति द्वारा ‘पùश्री’, ‘भाऊराव देवरस राष्ट्रीय सम्मान’ भी है।
मिजोरम में हिन्दी: डाॅ. इंजीनियरी जेनी हिन्दी के प्रोफेसर हैं तथा ‘पूर्वांचलीय हिन्दी साहित्य’ पर शोधकार्य किया है। इनका हिन्दी मिजो शब्दकोष प्रकाशित हो चुका है। आर.एल.थनमोया एवं ललथलमुआनो हिन्दी-मिजो परियोजना पर कार्य कर रहे हैं।

मेघालय में हिन्दी:

यहाँ की दो प्रमुख भाषाओं – खासी तथा गारो का व्यतिरेकात्मक विष्लेषण का कार्य हो रहा है। वर्ष 1976 में हिन्दी संस्थान के शिलांग केन्द्र की स्थापना हुई।

त्रिपुुरा में हिन्दी:

त्रिपुरा विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग है। रामेन्द्र कुमार पाल ने हिन्दी प्रचारक के रूप में उल्लेखनीय कार्य किये हैं। डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा तथा खोमतिया देव वर्मा हिन्दी-काॅकबराक परियोजना पर कार्य कर रहे हैं। डाॅ मिलन राणी जामातिया, त्रिपुरा विश्वविद्यालय भी विगत कुछ वर्षों से हिन्दी प्रचार-सिंार का अच्छा काम कर रही हैं।

अरुणाचल प्रदेश में हिन्दी:

अरुणाचल प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जिसकी सीमाऐं तिब्बत, म्यानमार देशों के साथ प्रायः 1300 कि.मी. व्याप्त है। 30 से अधिक विभिन्न जनजातियों के लोग यहाँ वास करते हैं। एक उत्सुकता की बात यह है कि अरुणाचल प्रदेश में लोगों के बीच सम्पर्क भाषा हिन्दी है। यद्यपि सरकारी कामकाज अंग्रेजी में चलता है परंतु नई पीढ़ी के लोगों में हिन्दी ही ज्यादा प्रचलित है। उस समय के ‘नेफा’ में वर्ष 1956 में प्रशासनिक आदेश (केन्द्र सरकार) के द्वारा हिन्दी को विद्यालयों में पढ़ाना अनिवार्य कर दिया गया। डाॅ. जोराम यालम नाबम द्वारा रचित कहानी संग्रह ‘साक्षी है पीपल’ यह किसी अरुणाचली साहित्यकार द्वारा हिन्दी में किया गया पहला सृजनात्मक प्रयास है। इस पुस्तक में समाज में व्याप्त अरूणाचली स्त्री के जीवन संघर्षों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। यालम जी का संबंध अरुणाचल की प्रमुख जनजाति ‘निशी’ से है। ईटानगर के युवाकवि एवं अध्यापक श्री तारो सिंदिक व डाॅ. (श्रीमती) जोराम आन्या भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं।
सिक्किम में हिन्दी: नेपाली भाषा सिक्किम राज्य की सम्पर्क भाषा है, जिसकी लिपी ‘देवनागरी’ है। इस राज्य में हिन्दी को लेकर किसी भी प्रकार की विरोध भावना नहीं है। ‘सुवास दीपक’ सिक्किम के बड़े हिन्दी साहित्यकार हैं। इन्होंने हिन्दी में मौलिक रचनाओं के साथ-साथ नेपाली-हिन्दी दोनों भाषाओं में अनुवाद कार्य भी किया है। ‘बढ़ते बीस कदम’ नाटक सिक्किम की प्रथम हिन्दी रचना है। ‘खुला दरवाजा और पेड़’ सुवास दीपक द्वारा विरचित एक मौलिक कविता संग्रह है। ‘चक्रव्यूह तथा अन्य कहानियाँ’ सिक्किम की हिन्दी भाषा की पहली मौलिक कहानी संग्रह है।

असम में हिन्दी:

असम में बड़ी संख्या में राजस्थान, हरियाणा से आये हुए व्यापारी वर्ग, उत्तर प्रदेश, बिहार से आये हुए कुछ कर्मचारी एवं लाखों की संख्या में आये मजदूर वास करते हैं। इनमें से प्रायः सभी लोगों की हिन्दी मातृभाषा या रोजमर्रा जीवन में उपयोग करने वाली भाषा है। अन लोगों ने अपनी बुद्धि, मेहनत के बल पर असम के सामाजिक, आर्थिक क्षेत्रों में शक्तिशाली स्थान बनाया हुआ है। अपनी जीविका कमाने के साथ-साथ हिन्दी एवं हिन्दुत्व का संरक्षण तथा संवर्धन में अत्यंत सराहनीय प्रयास किये है। इसीलिए अनेक बार राष्ट्र विरोधी विभिन्न आतंकवादियों ने इन हिन्दी भाषी लोगों पर आक्रमण किये, सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतारकर यहाँ से पलायन करने के लिये मजबूर किये। इनके अलावा सैकड़ो चाय बगानों में कार्यरत लाखों संख्या में मजदूर जो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड से आये हैं, उनमें प्रायः सभी लोग अपनी-अपनी बोली के साथ-साथ हिन्दी का उपयोग करते हैं।

डाॅ. देवेन्द्र चंद्र दास (‘सुदामा’ नाम से परिचित) स्थानीय असमीया समाज से हिन्दी भाषा के एक उच्चकोटि साहित्यकार हैं। इन्होनें हिन्दी में 50 से अधिक पुस्तक लिखे हैं। अनेक सरकारी, गैर सरकारी संस्थाओं ने अनेक पुरस्कारों से दास जी को सम्मानित कर चुके हैं। स्वयं सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में लंबे समय शिक्षक रहने के कारण अभी भी पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों में शिक्षक प्रशिक्षण वर्गों में तथा कार्यशालाओं में अपनी सेवाऐं दे रहे हैं। वे जातीय साहित्य परिषद के अखिल भारतीय संरक्षक हैं।

कुमार भास्कर वर्मन (सम्राट हर्षवर्धन के मित्र) 7वीं सदी में कामरूप राज्य के प्रभावशाली राजा थे। उनका जीवन ‘राजर्षि’ जैसा था। राज्य को विभिन्न क्षेत्रों में सबल बनाया। चीन यात्री ह्येन्त्सांग उनके पास कुछ वर्ष व्यतीत किये। उनके शासनकाल में ‘संस्कृत’ राज्य भाषा थी। स्वयं विद्वान होने के कारण उन्होनें विद्वानों का प्रोत्साहन किया। गुवाहाटी के पास कुमार भास्कर वर्मन के नाम से कुछ वर्ष पूर्व असम सरकार का एक संस्कृत विश्वविद्यालय प्रारम्भ हुआ।

बोड़ो भाषा की लिपि निर्धारण के समय एक परीक्षा के जैसी घड़ी थी। बोड़ो इलाके में इसाई आतंकवादी संगठननों का बोलबाला था। समांतराल सरकार चलती थी। बोड़ो साहित्य सभा में बोड़ो भाषा की लिपी के मताधिकार के समय देवनागरी, असमीया लिपी चाहने वाले एक हो जाने से ‘रोमन लिपी’ चाहने वाले समूह की हार हो गयी। देवनागरी बोड़ो भाषा की लिपी बन गई। उस आक्रोश में संदिग्ध छक्थ्च् आतंकवादियों ने बोड़ो साहित्य सभा के अध्यक्ष बीनेश्वर ब्रह्म की 19 अगस्त 2000 को हत्या कर दी। बीनेश्वर ब्रह्म ने अपनी सेवा 1968 से देबरगाँव हाईस्कूल में हिन्दी शिक्षक के नाते शुरू की।

गौहाटी विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की स्थापना के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर 19, 20 फरवरी 2020 में ‘हिन्दी की स्थिति-चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। इसमें विश्व के अनेक देशों से प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

चुनौतियाँ:

पूर्णतः अहिन्दी भाषा क्षेत्र होने के कारण ग्रहण योग्यता को लेकर समस्या आती है। शुद्ध हिन्दी बोलने के दबाव की वजह से गैर हिन्दी भाषी सार्वजनिक मंच पर हिन्दी बोलने में कतराते हैं। यहाँ जिन भाषा परिवारों (तिब्बत-बर्मी परिवार) की भाषाऐं प्रचलित हैं,उनमें से हिन्दी का दूर-दूर तक संबंध नहीं है। अवश्य ही असमीया भाषा इस संदर्भ में अपवाद है। असमीया भाषा में अत्यधिक शब्द संस्कृत के होने के कारण हिन्दी सीखने व समझाने में कुछ सुविधा होती है। आधुनिक भारत के अनेक इतिहासकार गंगा के तट तक ही भारतवर्ष की सीमा मानते थे। भारत के इतिहास में मध्ययुग में असम का उल्लेख बहुत कम है। इसकी वजह से भावनात्मक रूप से असम और शेष भारत के बीच एकात्मता का भाव दुर्बल हुआ। यही कारण है, कि देश के अन्य प्रांतों में सामाजिक, आर्थिक, आदि अनेक क्षेत्रों में भिन्नता आती है। असम और शेष भारत से सम्पर्क कम होने के समय से हिन्दी और असम की दिशाऐं अलग हो गईं।

संभावनाऐं:

हिन्दी राष्ट्रीय एकता की एक सशक्त कड़ी के रूप में विकसित हो रही है। सम्पर्क और परिपूरक भाषा के रूप में हिन्दी अपना स्थान बना रही है। पूर्वोत्तर की अनेक बोलियों (जनजातियों) में लिपि का अभाव है। रोमन लिपि, असमीया लिपि के अलावा देवनागरी लिपि एक सशक्त विकल्प बन सकती है। असमीया, बांग्ला, बिहारी भाषाओं में पर्याप्त संख्या में संस्कृत के शब्द होने के कारण सहजता से हिन्दी को लोग सीख सकते हैं। अविभाजित असम एक विशाल भूखण्ड होता था। 1947 के पश्चात 1948 में अरुणाचल (नेफा), 1963 में नागालैंड, 1972 में मेघालय और 1987 में मिजोरम असम से पृथक होकर नये राज्य बने। राजनैतिक दृष्टि से अलग होने पर भी असम, अरुणाचल, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम की पुरानी पीढ़ी के लोग असमीया को अच्छी तरह बोल और समझ पाते हैं। इसी समानता के कारण हिन्दी को आसानी से ग्रहण कर सकते हैं। पर्यटन क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र, मीडिया, यातायात सुविधा बढ़ने से नई पीढ़ी में दूर-दूर तक भ्रमण करने की मानसिकता भी भविष्य में हिन्दी का दैनंदिन जीवन में उपयोग बढ़ने की अपार संभावनाऐं हैं। विविध लिपि रहित भाषाओं में छिपे हुए मौखिक साहित्य, राति-नीति, आचार-विचार आदि को इस क्षेत्र से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने में हिन्दी एक सबल माध्यम बनेगी। हिन्दी का प्रचार-प्रसार तथा उसकी लोकप्रियता एवं व्यावहारिकता टी.वी. (धारावाहिक, विज्ञापन), सिनेमा, आकाशवाणी, पत्रकारिता, विद्यालय, महाविद्यालय तथा उच्च शिक्षा में हिन्दी भाषा के प्रयोग द्वारा बढ़ रही है।

जनजातियों में जातीय चेतना उदय: पूर्वोत्तर भारत के लोग कुछ वर्ष पूर्व तक अशिक्षित और पिछड़े थे। इसका कारण भौगौलिक अवस्थिति, आतंकवाद, यातायात की कम सुविधा, अधिक वर्षा (मौसम), लोगों की जीवन शैली में अल्प संतुष्ट स्वभाव। वर्तमान शिक्षित युवा वर्ग अपनी-अपनी जनजातियों के उत्तरण के लिए साहित्य निर्माण में लगा हुआ है। विविध साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं की स्थापना के माध्यम से वे अपनी जाति को आगे बढ़ाने हेतु प्रयत्नशील हैं। इसी चेतना के चलते वे अपनी भाषा, साहित्य, सांस्कृतिक कार्यक्रमों से लोगों को देश की मूलधारा से जोड़ने के लिए तत्पर हैं। उनके इस प्रयास में हिन्दी सहायक हो सकती है।

पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति दिनों-दिन सबल होती जा रही है और यह सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।

One Reply to “पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति एवं संभावनाएँ

  1. ‘पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी’ बहुत ही सराहनीय लेख है।।बहुत विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है।
    मैं निरुत्पल बोरा, असम से हूँ और वर्तमान मैं एक एम.फील(हिन्दी) शोधार्थी हूँ, विश्व-भारती, शान्तिनिकेतन में पढ़ रहा हूँ।

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