भारतीय शिक्षा के पुरोधा: श्रद्धेय लज्जाराम तोमर
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भारतीय शिक्षा के पुरोधा: श्रद्धेय लज्जाराम तोमर

ब्रह्माजी राव
विद्या भारती अखिल भारतीय मंत्री एवं
क्षेत्रीय संगठन मंत्री,
विद्या भारती पूर्वोत्तर क्षेत्र

किसी भी देश की शिक्षा उस देश के जीवन दर्शन, संस्कृति के अनुरूप होना चाहिए। तभी वह देश शक्तिशाली, समृद्धशाली होकर सारी मानव जाति और आगे जाकर सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड का संरक्षण एवं संवर्धन में अपनी भूमिका सफलता से पालन कर सकता है। अपना भारतवर्ष भी हजारों वर्षों के उत्थान-पतन से आागे बढ़ते हुए 1947 अगस्त 15 को अंगे्रजों के शासन से आजाद हुआ, परन्तु पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित लाॅर्ड मैकाले द्वारा प्रारम्भ की गई शिक्षा (जो भारत के शिक्षित वर्ग को इस देश की जड़ो के साथ न जोड़ता हो) से आजाद न हो पाई।

1952 में सरस्वती शिशु मंदिर योजना के अंतर्गत प्रथम विद्यालय उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में प्रारम्भ हुआ। भाऊराव देवरस, नानाजी देशमुख, कृष्णचन्द्र गांधी, हनुमान प्रसाद पोद्दार आदि मनीषियों ने इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो बाद में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान का विशाल रूप धारण किया। औपचारिक एवं अनौपचारिक (एकल विद्यालय/संस्कार केन्द्र) रूप से चलने वाले इन 25,000 से अधिक छोटे-बड़े विद्यालयों में 35 लाख से अधिक भैया-बहिन प्रायः 1.5 लाख आचार्यों के मार्गदर्शन में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इस विशाल कार्य का विस्तार एवं विकास में सुदीर्घकाल मार्गदर्शन करने वालों में अग्रणी व्यक्ति मा. लज्जाराम तोमर थे।
लज्जाराम जी का जन्म 21 जुलाई 1930 को मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में स्थित ’बघपुरा’ गांव में हुआ। पिता ठाकुर देवकिशन सिंह तोमर एवं माता सावित्री देवी थीं। 1945 में आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने। 1957 में आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी विषय), बी.एड़. करने के बाद प्राध्यापक बने। 1958 में शासकीय प्राध्यापक पदवी त्याग कर आगरा में सरस्वती शिशु मंदिर के संस्थापक प्रधानाचार्य एवं 1961 में आगरा में ही सरस्वती विद्या मंदिर इंटरमीडियट काॅलेज के प्राचार्य बने। 1972 में उत्तर प्रदेश में भारतीय शिक्षा समिति के संस्थापक मंत्री बने। परवर्ती काल में 1977 में अपने पारिवारिक जिम्मेदारी से मुक्त होकर राष्ट्रीय स्यवंसेवक संघ के प्रचारक बनकर राष्ट्रसेवा हेतु स्वयं को समर्पित कर दिया। 1979 में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के प्रथम संगठन मंत्री बने।

1952 में सरस्वती शिशु मंदिर योजना के अंतर्गत प्रथम विद्यालय उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में प्रारम्भ हुआ।

लज्जाराम तोमर जी बहु आयामी प्रतिभा के अद्भुत व्यक्तित्व थे। वह मूलरूप से आचार्य, संघ के प्रचारक (राष्ट्रीय विचारों का वाहक) तथा विद्या भारती के संगठन मंत्री और मार्गदर्शक के रूप में जाने जाते हैं। साथ ही वे चिंतक, योगसाधक, कुशल लेखक थे। ‘‘समाज परमेश्वर के प्रति प्रगाढ़ प्रेम ही अपने कार्य का आधार है।’’ यह दृष्टि उनमें सदैव बनी रहती थी। वे स्वाथिमानी थे, किन्तु अहंकार शून्य। निर्भय होकर नये-नये प्रयोग सहित कार्य करने की वे सदैव कार्यकर्ताओं को प्रेरणा देते थे। सम्मान, पुरस्कार, आदि की वे लालसा नहीं रखते थे। वे प्रायः सफेद धोती-कुर्ता एवं कंधे पर उत्तरीय अथवा शाॅल धारण करते थे। धीर-स्थिर स्वभाव, विषयों का गहराई से चिन्तन करना, अच्छी हिन्दी बोली में अपना विचार व्यक्त करना उनका स्वभाव था। योग साधना, परिस्थियों का आकलन करते हुए गंभीरता से युक्त प्रसन्न मुद्रा से धीरे-धीरे चलते हुए कार्यकर्ताओं के निकट आते समय ऐसा लगता था, कि मानो कोई भारतीय मनीषी आपसे मिल रहा हो।

लज्जाराम तोमर जी एक विचारक के साथ ही उच्चकोटि के शोधकर्ता तथा प्रबुद्ध एवं परिपक्व लेखक थे। प्रायः उनके भाषणों में ‘‘अनुभूत ज्ञान’’ शब्द आता था। ज्ञान के अनुशीलन में तत्पर और ज्ञान के प्रसार के लिए लेखन भी करते थे। उनके द्वारा लिखे गए विभिन्न ग्रन्थ शिक्षा के संबंध में उनके मौलिक चिन्तन को प्रकट करते हैं। भारतीय शिक्षा के मूल तत्व, प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति, भारतीय शिक्षा के मनोवैज्ञानिक आधार, विद्या भारती चिन्तन की दिशा, विद्या भारती दिशा बोध, विद्या भारती की अभिनव पंचपदी शिक्षण पद्धति, नैतिक शिक्षा, बाल-किशोर बोध कथायें, विद्यालय सामाजिक चेतना का केन्द्र बनें, परिवारों में संस्कारक्षम वातावरण क्यों और कैसे?, बाल भारती (छात्र संसद), विद्या भारती की विद्यालय संकुल योजना, जन्मदिन कैसे मनायें आदि प्रमुख हैं।

लखनऊ में निराला नगर स्थित विद्या भारती शोध संस्थान, प्रशिक्षण केन्द्र, कुरूक्षेत्र के विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान निर्माण एवं विकास में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। उनके द्वारा लिखे गये ग्रन्थ एवं किये गये शैक्षिक कार्यों के संबंध में कई लोग शोध कार्य करके पी.एच.डी. उपाधि प्राप्त किये और कई लोग वर्तमान में शोध कर रहे हैं। 1995 में लज्जाराम तोमर जी ने जर्मनी, इंग्लैण्ड, हाॅलैण्ड, आदि देशों की यात्रा वहाँ की शैक्षिक संगोष्ठियों में भाग लेने हेतु की। विद्यालयों में भैया-बहिनों के अभ्यास के लिए ‘अष्टादश श्लोकी गीता’ प्रारम्भ कराई।

Books of Lajjaram Tomar (लज्जाराम तोमर)

1986 में सामाजिक कार्यों में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिये आगरा महानगर में आयोजित सार्वजनिक अभिनन्दन कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने उनको सम्मानित किया। वर्ष 1999 में अमेरिकन बाॅयोग्राफिकल इंस्टीट्यूट द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इस शताब्दी के विशिष्ट शिक्षाविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपने डायरेक्टरी में श्री तोमर जी का जीवन परिचय प्रकाशित किया गया एवं उन्हें स्वर्णपदक से सम्मानित भी किया। 6 मई 1999 को अखिल गायत्री परिवार ने श्री तोमर जी को ‘‘संस्कृति भूषण’’ अलंकरण से सम्मानित किया। यह सम्मान उत्तर प्रदेश के तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष श्री केसरीनाथ त्रिपाठी के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। 3 दिसम्बर 2000 को गुजरात सरकार के द्वारा गुजरात के महामहिम राज्यपाल मा. सुंदर सिंह भंडारी जी ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया।

भारतीय शिक्षा के संबंध में चर्चा करते समय वे कहते थे – ‘‘भारतीय शिक्षा योग आधारित शिक्षा है।’’ इसमें मनुष्य का सर्वांगीण विकास – शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक पहलू सम्मिलित हैं। इस सर्वांगीण विकास के लिये शारीरिक शिक्षा, योग शिक्षा, संगीत शिक्षा, संस्कृत शिक्षा और नैतिक-आध्यात्मिक विषयों के द्वारा प्रयास किया जाना चाहिए। जो अपने प्राचीन उपनिषदों में वर्णित है। वे अपनी दिनचर्या में प्रतिदिन योगाभ्यास करते थे। लम्बे समय योगाभ्यास करने के कारण वे अच्छे योगसाधक बने। आयु 65 वर्ष होने के बाद भी आचार्य प्रशिक्षण वर्गों में वे स्वयं योगाभ्यास कराते थे।

भारतीय शिक्षा योग आधारित शिक्षा है।

देशभर में विद्या भारती कार्य के विस्तार एवं विकास के लिए नियमित रूप से प्रवास करते थे। अपने पूर्वोत्तर भारत में वे कई बार आए। 1994 में त्रिपुरा में विद्या भारती के प्रथम विद्यालय स्थापना के समय, 1997 में तेजपुर में पूर्वोत्तर जनजाति शिक्षा समिति के स्थापना काल में, गुवाहाटी में आयोजित विशाल शिशु सम्मेलन (जिसमें पूर्वोत्तर के सभी राज्यों से 3000 से अधिक भैया-बहिन उपस्थित थे) में भी पूर्ण समय उपस्थित रहे। पत्राचार के माध्यम से भी हजारों कार्यकर्ताओं के साथ वे सम्पर्क रखते थे।

सरकार पर निर्भर न होकर शिक्षाविदों के द्वारा समाज में भारतीय चिंतन पर आधारित शिक्षा प्रणाली के विकास के लिए विद्या भारती के अलावा अन्य शैक्षिक संगठनों को एक मंच पर लाने के लिए प्रयास किया। इस कार्य हेतु राष्ट्रीय स्तर पर सामुहिक प्रयास पर बल देने के लिये संगोष्ठियाँ आदि आयोजन किये, जिसमें महर्षि विद्या मंदिर, विवेकानन्द केन्द्र, अरविन्द सोसायटी, गायत्री परिवार, चिन्मय मिशन, आर्ट आॅफ लिविंग आदि शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधि भी सम्मिलित हुए।
उन्होनें 17 नवम्बर 2004 को अपना शरीर त्याग दिया। अपने जन्मस्थान ‘बघपुरा’ गांव में अपनी सम्पूर्ण पैत्रक सम्पत्ति से अपने पिताजी की स्मृति में एक विद्यालय व माता जी की स्मृति में शिव मंदिर निर्माण करवाकर उसके संचालन के लिए स्थायी न्यास गठन किया। अपने जीवन के अंतिम समय में जब वे कैंसर से पीड़ित थे, तब भी वे आने वाली पीढ़ियों को निरन्तर कार्य और कर्तव्यपरायणता का संदेश देते हुए सक्रिय रहे। उनका प्रेरणा वाक्य था :

“योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।”

अर्थात- समस्त आसक्ति और संगदोष को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर, यही जीवन की सबसे बड़ी साधना है।

वे सुख, दुखों को समान रूप से अनुभव करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा क्षेत्र में कार्य करते रहे। समाज में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ताओं में साधारणतः दो प्रकार के लोग देखने को मिलते हैं, एक अपनी प्रतिभा से देश के प्रति सर्मपण भाव, कर्ममय जीवन द्वारा आने वाली पीढ़ियों के लिये प्रेरणा प्रदान करने वाले एवं दूसरे समर्पण भाव से देश के लिये काम करने वाले। ‘‘कोई चलता पद चिन्हों पर, कोई पद चिन्ह बनाता है।’’ इस पंक्ति को सार्थक करते हुए माननीय लज्जाराम जी शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं को प्रेरणा देते रहेंगे।

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