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भारतीय शिक्षण पद्धति में शोध गुणवत्ता और शिक्षक प्रशिक्षण विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

  • भारत को विश्वगुरू बनाने के लिए हम भारतीयों को नवोन्मेष आधारित शोध और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा।
  • वनवासियों की समस्याओं को हमें समझना होगा और उनके पलायन को रोकना होगा।
  • सामाजिक कल्याण की भावना से ओतप्रोत विभिन्न प्रकार के शोध कार्य करने होंगे।

संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जे.एन.यू., नई दिल्ली और  शंकरदेव रिसर्च फाउंडेशन, गुवाहाटी के संयुक्त तत्त्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का आयोजन जे.एन.यू. के प्रोफेसर  डॉ. हरिराम मिश्र और सह-संयोजन  शंकरदेव रिसर्च फाउंडेशन के संयोजक डॉ. दिब्यज्योति महन्त के द्वारा किया गया।

इस संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. टी.बी. कट्टिमनी (कुलपति, केन्द्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, आन्ध्र प्रदेश) और विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. कपिल देव मिश्र (कुलपति, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश) उपस्थित रहे।

इस संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल (डीन, संस्कृत संस्थान, जे.एन.यू.) ने की। इस सफल संगोष्ठी संचालन योगेन्द्र भारद्वाज (रिसर्च स्कॉलर, जे.एन.यू) ने किया और मंगलाचरण सुमन्या (संस्कृत छात्रा) ने किया।

डॉ. हरिराम मिश्र ने अपने प्रास्ताविक वक्तव्य में कहा कि भारत को विश्वगुरू बनाने के लिए हम भारतीयों को नवोन्मेष आधारित शोध और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। उन्होंने चाणक्य को उदाहृत करते हुए कहा कि वर्तमान सन्दर्भ में शिक्षकों के प्रशिक्षण पर भी ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि एक सुयोग्य शिक्षक ही सुयोग्य राष्ट्र का निर्माण करने में सक्षम है।

प्रो. कट्टिमनी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में अन्तर्निहित शोध गुणवत्ता और अन्तर्वैषयिक शोध आदि बिन्दुओं को अपने मुख्य वक्तव्य में समाहित किया। उन्होंने कहा कि आज जैवविविधता के संरक्षण और संवर्द्धन हेतु शोध आवश्यक हैं। वनवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास हेतु नवोन्मेष आधारित शोध प्रासंगिक है, क्योंकि वनवासियों की समस्याओं को हमें समझना होगा और उनके पलायन को रोकना होगा। जोकि आज एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है। उन्होंने महिला शिक्षा और प्रत्येक वर्ग में स्किल डेवलपमेंट को भी शामिल करने का सुझाव दिया।

डॉ. कपिल देव मिश्र ने शिक्षक प्रशिक्षण के विषय में अपने विचार रखे।प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने संस्कृत और सांस्कृतिक चेतना के उत्थान पर चर्चा करते हुए कहा कि अब हमें अपने राष्ट्र को उन्नति के शिखर पर लेकर जाना है। इसलिए हमें सामाजिक कल्याण की भावना से ओतप्रोत विभिन्न प्रकार के शोध कार्य करने होंगे। यह समय अपनी गौरवगाथा का गुणगान न करते हुए प्रैक्टिकल कार्य करने का है।

कार्यक्रम के अन्त में एक प्रश्नोत्तर सेशन हुआ और डॉ. दिब्यज्योति महन्त ने इस कार्यक्रम में भाग ग्रहण करने वाले सहभागियों और आमन्त्रित अतिथियों, संयोजन में कार्यरत टीम का धन्यवाद ज्ञापन किया। इस कार्यक्रम के सफल आयोजन में श्री विकास जी, धीरज जी, लाल जी आदि का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ। इस कार्यक्रम को यूट्यूब लाइव और फेसबुक लाइव के माध्यम से भी ब्रॉडकास्ट किया गया था।

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