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कैसे अंग्रेजों ने ध्वस्त की भारत की विकसित शिक्षा प्रणाली : आओ जाने – 1

– प्रशांत पोळ हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था तथा पाठशालाएं अंग्रेजों ने प्रारंभ की, ऐसा कहा जाता है। अंग्रेज़ आने के पहले देश में शिक्षा के मामले में अंधकार ही था, ऐसा भी बताया जाता है। किन्तु सत्य परिस्थिति क्या थी…? अंग्रेजों और मुस्लिम आक्रांताओं के आने से पहले भारत में जो शिक्षा पद्धति थी, […]

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बरसात हो सवालों की!

– दिलीप वसंत बेतकेकर “बिल्ली की आँखें रात्रि के समय क्यों चमकती हैं, पापा!” राजू ने समाचारपत्र पढ़ते कुर्सी पर बैठे हुए अपने पिताजी से पूछा! पिताजी ने समाचारपत्र पर झुका अपना सिर थोड़ा सा ऊपर उठाते हुए, राजू की ओर आँखें गड़ाते हुए प्रति प्रश्न किया – “ये प्रश्न परीक्षा के लिये है क्या?” […]

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मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति

– प्रो. रविन्द्र नाथ तिवारी भाषा विचारों के आदान-प्रदान करने का सशक्त माध्यम है। किसी भी बच्चे की प्रथम शैक्षिक गुरु माता ही होती है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि छोटे बच्चे अपने घर की भाषा/मातृभाषा में सार्थक अवधारणाओं को अधिक तेजी से सीखते और समझते हैं। सामाजिक कल्याण और बौद्धिक नेतृत्व का गुण भी […]

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पूर्वोत्तर भारत में कोरोना आपदा को अवसर में परिवर्तित करती विद्या भारती

डाॅ. पवन तिवारीसह संगठन मंत्रीविद्या भारती पूर्वोत्तर क्षेत्र स्वामी विवेकानन्द के विचारों में बालक की अन्तर्निहित शक्तियों का बहिरागमन ही शिक्षा है। वे कहते थे कि शिक्षा मनुष्य को साहसी बनाती है, जिससे वह किसी भी कार्य को आसानी से करने हेतु सन्नद्ध हो जाता है। वस्तुतः उत्कृष्ट शिक्षा को प्राप्त करना प्रत्येक बालक का […]

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तैयारी परीक्षा की…भावी जीवन की

 – दिलीप बेतकेकर “नमस्कार विद्यार्थी मित्रों, कैसी चल रही है तैयारी?” आपके पास पढ़ने के लिये शुरूआत करने के दिन से कितने दिन पहले यह प्रश्न पूछा जाना ठीक होगा? देखा जाये तो कितने भी दिन बहुत कम अर्थात पर्याप्त नहीं भी हैं और हो सकता है पर्याप्त हों भी! इतने दिनों की अवधि में […]

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भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-26 – (व्यक्ति, व्यक्तित्व और विकास)

– वासुदेव प्रजापति आजकल “व्यक्तित्व विकास” शब्द अत्यधिक प्रचलित है। अनेक व्यक्ति व संस्थान व्यक्तित्व विकास शब्द के स्थान पर “पर्सनेलिटी डेवलपमेंट” शब्द का प्रयोग करते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि ये दोनों शब्द समान अर्थ वाले हैं। पर्सनेलिटी डेवलपमेंट शब्द का प्रयोग करने में उन्हें गौरव की अनुभूति भी होती है। किन्तु […]

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भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-25 – (दूसरे वर्ष में प्रवेश)

 – वासुदेव प्रजापति “ज्ञान की बात” एक पाक्षिक स्तंभ है, जिसकी अब तक 24 कड़ियां आ चुकी हैं। अर्थात् इसे प्रारंभ हुए अब तक एक वर्ष की अवधि पूर्ण हो चुकी है। इस एक वर्ष की अवधि में हमने ज्ञान-अज्ञान को समझा। ज्ञानार्जन के साधनों कर्मेंद्रियां, ज्ञानेंद्रियां, मन, बुद्धि, अहंकार एवं चित्त को जाना। ज्ञानार्जन […]

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भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-24 – (दान)

 – वासुदेव प्रजापति भारतीय शिक्षा की एक प्रमुख विशेषता अर्थ-निरपेक्षता है। आज हमनें पश्चिमी शिक्षा से प्रभावित होकर जीवन में अर्थ को सर्वोपरि मान लिया है। अर्थ की प्रमुखता होने से जीवन के सभी कार्य अर्थ सापेक्ष हो गये हैं। हमारे यहाँ धर्म, ज्ञान, सेवा व चिकित्सा को पैसों से श्रेष्ठ माना है। ये श्रेष्ठ […]

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पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति एवं संभावनाएँ

ब्रह्माजी राव, अखिल भारतीय मंत्री एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र संगठन मंत्री विद्या भारती राष्ट्र संघ में कुल 252 देश हैं। इन देशों में प्रायः 700 करोड़ लोग रहते हैं। दुनिया में अत्यधिक संख्या में लोग मंडारिन (चीनी) भाषा में बात करते हैं। दूसरे स्थान पर अंग्रेजी, तीसरे स्थान पर स्पेनिश तथा चैथे स्थान पर हिन्दी है। […]