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श्री गुरु नानक देव जी के त्रि-सूत्री सिद्धांत – 12 नवंबर 550वां प्रकाश वर्ष विशेष

– डॉ० नरेंद्र सिंह विर्क

भारतीय पंरपरा के अनुसार, जब दुनिया में अन्याय, उत्पीड़न, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्थिति अधोगति में जाने लगे तो उस समय दुनिया में कोई अवतार या गुरु आगमन होता है जो दुनिया को पतन से उठाकर, सच्चे गुणों को अपना कर ईश्वर के साथ विलय होने का रास्ता दिखता है। ऐसे अवतारी पुरूष, गुरु जन-मानस को प्रेम करुणा का अमृत देते हैं और सही रास्ता दिखाते हैं।

गुरु नानक देव जी का जीवन मानवता के लिए सच्चाई की प्राप्ति के लिए रास्ता दिखाने का काम करता रहा और भविष्य में भी करता रहेगा। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन देश-देशांतरों की यात्रा में (जिन्हे ‘उदासियो’ का नाम दिया गया है) गुजारा। लोगों को धर्म का वास्तविक स्वरुप समझा कर परमात्मा में लीन होने का रास्ता दिखया।

गुरु साहिब ने लोगों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक जीवन में आई गिरावट को खत्म करके जीवन का असली उद्देश्य समझाते हुए उन्हें उच्च आदर्शों का मॉडल ‘किरत करने, नाम जपने और बाँट छकने’ का तीन सूत्री सिद्धांत दिया। जिसमें आदर्श जीवन का संपूर्ण दर्शन है। इन सिद्धांतों को अपनाने वाला व्यक्ति समाज में रहते हुए, कार-विचार करते हुए, परिवार की पालना करते हुए स्वस्थ समाज के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पाकर ईश्वर के साथ विलय होता है।

गुरुबाणी के अनुसार :

‘‘उदम् करेदिआ जीउ तूँ कमावदिया सुख भुंचु।।

धिआइदिआ तूं प्रभु मिलु नानक उतरी चिंत।।’’

शरीर के निर्वाह के लिए स्वस्थ आहार की प्राप्ति और तंदुरुस्ती के लिए श्रम करना बहुत जरुरी है। श्रम परिवार की जरुरतों के लिए भी। इसके अलावा, समाज में जरुरतमंदों की मदद के लिए भी श्रम करना आवश्यक है। एक श्रम करने वाला व्यक्ति समाज पर बोझ नहीं बनता बल्कि अन्य लोगों की आय के लिए भी संसाधन बनाता है। उसका सामाजिक और आर्थिक जीवन उत्पन्न हो जाता है। कीर्तिमनुष्य स्वाभिमान की जिंदगी जीता है और किसी पर निर्भर नहीं होता । कीर्तिमान मनुष्य आलसी नहीं होता है। कीर्ति मनुष्य स्वस्थ रहता है।

गुरबाणी का पवित्र गुरुवाक् है:

“घालि खाड़ किछु हथहु देइ।।

नानक राहु पछाणहि सेई।।”

श्रम से संबंधित गुरु साहिब के जीवन की एक साखी प्रचलित है कि एमनाबाद के एक साहूकार मलिक भागों ने अपने घर में ब्रह्म भोज रखा था जिसमें सभी साधु-संतों को बुलाया गया। उन्होंने गुरु साहिब को निमंत्रण भेजा लेकिन गुरु जी ने इस भोज में आने से इनकार कर दिया। गुरु जी को बार-बार अनुरोध करने पर आप जी उन्हें उपदेश देने के लिए गुरु जी उनके घर गए लेकिन भोजन नहीं लिया। मलिक भागों के पूछने पर गुरुजी ने कहा कि तुम्हारी कमाई सच्चे श्रम की ना होकर और गरीबों के उत्पीड़न से इकठ्ठा की गई है, इसलिए इसमें गरीबों का खून है, इसलिए हम यह खाना नहीं खा सकते।

मलिक भागों ने इसका प्रमाण माँगा। गुरुजी ने मलिक भागों से तैयार भोजन मँगवाया और भाई लालों के घर में बनाई गई कोधरे की रोटी मँगवाई। गुरु जी ने अपने दाहिने हाथ में भाई लालों की रोटी और अपने बाएँ हाथ में मलिक भागों की रोटी ली। जब गुरुजी ने दोनों रोटियों को हाथ में दबाया तो मलिक भागों की रोटी से खून निकला और भाई लालों की रोटी से दूध की धारा बह निकली। मलिक भागों ने गुरु जी से माफी माँगी और आगे से अपने हाथों से काम करने का संकल्प लिया।

नाम जपना:  दुनिया में सबसे उत्तम है नाम जपना। गुरुबाणी का हुकुम है-

“अवरि काज तैरे कितै न काम।

मिलु साधसंगति भजु केवल नाम।।” अंग साहिब-12

ईश्वर के नाम से मनुष्य में दैवीय गुण पैदा हो जाते हैं, जिससे मानव देवता बन जाता है, समदृष्टि आ जाती है इससे साझीवालता (भाईचारा) की भावना पैदा होती है, उसकी स्थिति गुरबाणी अनुसार ऐसी बन जाती हैः

“सभे साझीवाल सदइनित किसै न दिसहि बाहरा जीऊ।” अंग साहिब – 97

इंसान हर किसी की भलाई चाहता है। वह प्राणियों की भलाई और परोपकार के लिए हमेशा तैयार रहता है और किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता। किताबी ज्ञान हमें Knowledge दे सकता है लेकिन नाम Wisdom पैदा करता है। उसको अच्छे और बुरे की समझ हो जाती है। वह संसार को संवारने में जीवन लगा देता है। संम्पूर्ण प्रकृति की संभाल करता है। गुरबाणी का आदेश है:

‘सरब रोग अउखदु नाम।।’ अंग साहिब-274

नाम सभी रोगों की दवाई है। इस पर बहुत शोध किया गया है जिससे यह साबित हो गया है कि नाम जपने वाला व्यक्ति सभी प्रकार की बीमारियों से छुटकारा पा सकता है और शारीरिक व मानसिक तौर पर तंदरूस्त हो जाता है। जिस प्रकार शरीर के लिए आहार आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मा का आहार प्रभु का नाम है। जब कोई व्यक्ति नाम जपता है, तो उसके भीतर आध्यात्मिक बल बढ़ता है फिर वह शारीरिक बल से सही दिशा में काम ले सकता है। तनजानिया विश्वविद्यालय द्वारा शोध किया गया कि रात के 12 बजे से सुबह 7 बजे तक परमात्मा की बंदगी करने से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा (Cosmic energy) मिलती है। इस समय में 4 बजे से 5 बजे तक का समय Prime Time होता है। प्रभु के नाम का जाप करने से इंसान में भगवान के सद्गुण आ जाते हैं। इस तरह से इंसान गुणवान बनता है। नाम मनुष्य के मन को जागृत करता है। गुरुबाणी का आदेश है:

इहु मन सक्ति इहु मनु सीऊ।

इहु मनु पंच ततु को जीऊ।। अंग साहिब 340

बाँट कर छकना: कीर्ति मनुष्य में बाँट कर छकना (खाने) की प्रकृति उत्पन्न होती है। वह समाज के बुरे लोगों को पुनः सँवारने के लिए समय व्यतीत करता है। सिक्ख पंथ में सिक्ख की कमाई का दसवाँ हिस्सा, गुरु के नाम पर अलग करता है, जिसे ‘दशबन्ध’ कहा जाता है। इस कमाई का उपयोग जरुरतमंद, गरीब, बेसहारा, अनाथ लोगों के कल्याण के लिए किया जाता है, जैसे गरीब बच्चों को पढ़ाना आदि। ‘जॉन रॉक फिलर’ नामक एक दानी कहता है कि उसके द्वारा किए गए दान से उसका धन बढ़ जाता है। वह तथ्य अर्थशास्त्र के सिद्धांत के विपरीत है, लेकिन जब वह अन्य लोगों पर सिद्धान्त का शोध करता है, तो तथ्य सामने आते हैं कि यह सिद्धांत  Universal low है। इस प्रकार दान का सिद्धांत है कि आप जितना बाँटोगे उससे अधिक प्राप्त करोगे। गुरु नानक देव जी ने पहले ही हमें यह सिद्धान्त दे दिया है। गुरबाणी के अनुसारः

‘खावहि खरचहि रल मिल भाई।।

तोटि न आवै बधदो जाई।।’

दुनिया में जहाँ भी कोई प्राकृतिक आपदा या युद्ध होता है या दुनिया के किसी भी क्षेत्र में भुखमरी और महामारी फैलने के कारण कोई आफत आ जाती है तो ‘खालसा एंड सोसाइटी’ वहां लंगर का आयोजन करती है और उस जगह के लोगों के पुनर्वास के लिए प्रंबध करती है, फिर भी धन आदि की किसी तरह की कोई कमी नहीं आती है।

उपरोक्त किरत करने, नाम जपने और बाँट कर छकने का सिद्धांत समाज को नई दृष्टि, आपसी भाईचारा, प्रेम और सुरक्षा, पृथ्वी- जल-वायु के साथ निकटता, जीव-जन्तुओं के साथ प्यार और कादर की प्रकृति की संभाल करता है। प्रकृति की गोद का आनंद लेते हुए, कादर में विलय हो जाता है, जो मानव दुनिया में आने का मुख्य उद्देश्य है।

श्री गुरु नानक देव जी के त्रि-सूत्री सिद्धांत ‘किरत करने, नाम जपने और बाँट कर छकने’ को आज की शिक्षा में सम्मिलित कर नई पीढ़ी को अवगत करवाने की आज महती आवश्यकता है।